shobhna upadhyay's photography

बाघ पकड़ा गया, लेकिन हमें फिर भी तो इन बाघों के साथ ही रहना है… पढ़िए पुलिस अफसर प्रमोद साह का लेख

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जंगलियागांव में बाघ के पकड़े जाने से राहत, कई गांवों में अब भी दहशत बरकरार
कुमाऊं जनसन्देश डेस्क
हल्द्वानी। इन दिनों पूरा उत्तराखंड गुलदार, बाघ और तेंदुए की दहशत के साये में है। सुदूर गांवों से लेकर राजधानी देहरादून तक बाघ की धमक देखने को मिल रही है। आखिर बाघ और तेंदुए इतने हिंसक क्यों हो गए हैं। क्या वन्य क्षेत्रों में मानव की दखलंदाजी बढ़ गई है या बाघों के स्वभाव-व्यवहार में बदलाव आ गया है। जबकि सालों से हम, समाज और बाघ साथ ही रहते आए हैं और आगे भी साथ ही रहना है। बीते दिनों भीमताल के जंगलियागांव में एक बाघ अवश्य पकड़ा गया है और लोगों को थोड़ा राहत महसूस हुई है, लेकिन हमें फिर भी इन जीव जन्तुओं के साथ तो रहना ही है। ऐसे में यह सोचने का वक्त है। इन सब बिंदुओं पर आधारित यह लेख यह लेख प्रमोद साह की फेसबुक वाॅल से लिया गया है।

police officer pramod sah
police officer pramod sah

प्रमोद साह उत्तराखंड पुलिस के अधिकारी हैं। सामाजिक मुद्दों पर उनकी कलम बरबस चल पड़ती है। पेश है उनका फेसबुक लेखः-

बाघ और हम सह-अस्तित्व पर सवाल..!
25 दिसंबर की रात आखिरकार तीन महिलाओं को अपना निवाला बनाने वाला भीमताल जंगलिया गांव क्षेत्र का आदमखोर बाघ पकड़ा गया..
फौरी तौर पर यह बेहद राहत देने वाली खबर है । लेकिन यह ठहर कर सोचने का भी वक्त है, कि हमें, हमारे समाज को और बाघों को तो साथ-साथ ही रहना है ।
फिर आंखिर पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हुआ की बाघ और तेंदुए लगातार आदमखोर हो रहे हैं.. जबकि हमारा और बाघों का हजारों सालो से सहचर्य का जीवन रहा है ।
निश्चित रूप से हमारी जीवन शैली और पर्यावरण संतुलन में कुछ बड़ी चुकें हुई है।
बाघो के व्यवहार और विवशता को जिम कॉर्बेट से बेहतर शायद ही कोई समझे… जिम कॉर्बेट जो बाघ को जेंटलमैन कहते हैं, जंगल का राजा होकर भी बाघ सिर्फ खुद से मतलब रखता है, नहीं तो वह राजा जंगल की सरहद पर हमें कैसे नहीं देखता, वह क्या नहीं जानता हम सब उसकी दया पर ही हैं। वह तब तक जब तक उसे छेड़ा ना जाए , हमसे कोई मतलब नहीं रखता ..।

shikari lakhpat rawat
shikari lakhpat rawat

जिम कॉर्बेट बाघों से बेहद प्यार करते थे , उन्होंने अपने शिकारी जीवन में 1907 से 1931 के मध्य 19 बाघ और 14 तेंदुओ का शिकार किया, किसी नरभक्षी बाघ को शिकार करने से पहले वह महीनों उसके व्यवहार, उसके रास्ते को तस्दीक करते थे। तांकि कोई निर्दोष बाघ न मारा जाए ।
दुनिया की सबसे खूंखार नरभक्षी चंपावत बाघिन जिसने नेपाल में 234 फिर भारत में 202 कुल 436 मनुष्यो को अपना निवाला बनाया था, जब जिम ने उसका शिकार किया, तब जिम ने उसकी विवशता को समझा नरभक्षी बनने से पहले वह बाघिन भी उदात चित्त थी। जब से उसके शरीर में गोली लगी। एक उपरी जबड़ा टूटा, वह आदमखोर हो गई और उसके शिकार का आंकड़ा 436 पार हो गया।
इसी प्रकार रुद्रप्रयाग के आदमखोर चीता ने 124 व्यक्तियों को अपना निवाला बनाया था. जिम कॉर्बेट ने जितने भी बाघो को मारा सब ने आदम खोर बन खूब दहशत पैदा की थी, इनमें पनार का चीता, चुका की बाघिन, चावगढ़ की बाघिन, मोहान का आदमखोर चीता आदि मुख्य थे।
हजारों वर्षों से हमारा आदिवासी समाज, बाघों के साथ एक खूबसूरत युद्ध विराम के साथ जीता आ रहा था। तब भारत में लाखों की संख्या में बाघ थे, लेकिन बाघों के आदमखोर हो जाने के किस्से बहुत कम सुनाई देते हैं।
आदिवासी समाज प्रकृति के साथ समन्वय की वह विद्या जानता है कि वह बाघ ही नहीं पत्तों का भी सूख जाने तक जतन करता था। जहां ग्रामीणो और बाघों के अपने-अपने रास्ते और जल स्रोत थे, कोई एक दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप भी नहीं करता,
लेकिन 1864 में भारत में वन विभाग की स्थापना के साथ जंगलों में मनुष्य का दखल बड़ा, व्यावसायिक दोहन हुआ और शुरु हुआ बाघों के आदमखोर होने का सिलसिला ।
1875 से 1925 के बीच भारत में कुल 80 हजार बाघों का शिकार किया गया। उसी की परिणीति हमें 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही आदमखोर बाघों के आतंक के रूप में दिखाई देती है। इनमे चंपावत की बाघिन और रुद्रप्रयाग के आदमखोर के किस्से हम जानते ही हैं।

shobhna upadhyay
shobhna upadhyay

अब सवाल यह उठता है क्या अंग्रेजों के आने से पहले भारत में बाघों का शिकार नहीं होता था। बेशक होता था, लेकिन बहुत चुनकर, हालांकि बाघों का शिकार, और उन्हें पालना तब राजसी शौक था। अकबर ने फतेहपुर सीकरी में 1000 चीता पाले थे वहीं 86 बाघो का शिकार भी किया था.. जहांगीर के नाम भी 88 शेरों का शिकार दर्ज है।
1924 में भारत में बाघों की संख्या 1 लाख से अधिक थी। 1947 में जब हम आजाद हुए उस वक्त भी बाघ 40 हजार बचे थे ।
भारत में आजादी के साथ रजवाड़े तो खत्म हुए, लेकिन झूठी शान और सामंती मानसिकता बची रही जिसका सबसे अधिक कहर बाघों ने झेला ।
उदयपुर के महाराजा और गौरीपुर के राजा में से प्रत्येक ने 500 बाघों को मार डाला, टोंक के नवाब ने 600, सरगुजा के रामानुज शरण सिंह देव ने 1,100, और जयपुर के कर्नल केसरी सिंह ने 1,000 बाघों को मार डाला।
इन सब बातो से बाघ लुप्त प्राय जंतु की श्रेणी में आने को ही था, तभी 1973 में टाइगर रिजर्व और वन्य जंतु संरक्षण अधिनियम बाघो को बचाने के लिए लाया गया , तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भीबाघ संरक्षण के इन प्रयासों ने अपना असर दिखाया, बाघ जिनकी संख्या तब1820 रह गई थी , 2022 तक यह संख्या बढ़कर दूनी से अधिक 3682 हो चुकी है।इसमें सबसे बड़ा चमत्कार पन्ना क्षेत्र में हुआ जहां बाघो की संख्या शून्य से 40 पहुंच गई..।

जहां तक उत्तराखंड का प्रश्न है उत्तराखंड में वन्य – जीव संघर्ष की सबसे बड़ी चुनौती गुलदार ध्चीता पेश कर रहे हैं । राज्य गठन से अब तक राज्य में गुलदार के हमले से 517 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं ,जबकि बाघ के हमले में 172 जानें गई हैं ।
इस अवधि में बेपरवाह हो रहे गुलदार भी 1731 की संख्या में मारे गए हैं ।
वर्ष 2002 में जब जनपद चमोली के आदिबद्री क्षेत्र में 12 स्कूली बच्चों को निवाला बन चुके गुलदार का शिकार हंटर लखपत सिंह रावत ने किया, तब से रावत लगातार गुलदार और बाघों के व्यवहार का अध्ययन कर रहे हैं ।उनके नाम 53 लेपर्ड और दो टाइगर सहित कुल 55 आदमखोरो के शिकार का रिकॉर्ड गिनीज बुक में दर्ज है, जिसे रावत स्वयं उपलब्धि नहीं मानते,वे दुखी होते हैं ।
लखपत सिह रावत बताते हैं कुमाऊं की पहाड़ियों में जहां जंगल घने नहीं हैं। वहां अक्टूबर से दिसंबर के मध्य जंगलो के नजदीक तक घास काटे जाने से ही गुलदार के आदमखोर होने की सक्रियता देखी जाती है। इसे गुलदार की विवशता भी कह सकते हैं, उसके छिपने का स्थान कम हो जाता है, रोज आदमियों के साथ उसका मुकाबला होता है जिससे उसका व्यवहार बदलता है और वह हिंसक हो जाता है। आमतौर पर गुलदार सायं 6रू00 बजे से 8रू00 के मध्य गांव की सरहद पर सक्रिय रहता है। उसकी पसंद कुत्ते और बकरियां होते हैं,परिस्थिति बस वह बच्चे और महिलाओं पर हमला करता है।
शाम के वक्त हम अपने बच्चों और महिलाओं को खुले रास्ते में ना भेज कर भी बचाव कर सकते हैं ।
गुलदारो की संख्या का सही आंकलन ना होना भी हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है। वन विभाग उत्तराखंड में गुलदारो की संख्या ढाई हजार और बाघ 560 बताता है ।
उत्तराखंड में 16674 गांव हैं , प्रत्येक गांव में एक गुलदार का पहरा होता है, यह मान्यता है ।यदि इसे दो गांव पर भी एक गुलदार माने तब भी गुलदारों की संख्या संशय पैदा करती है ।
बाघ की प्रवृत्ति तो जंगल छोड़ने की नहीं होती है,यदि हम जंगल में ना जाएं तो बाघ से बचे रह सकते हैं। पार्वतीय जीवन के लिए गुलदार ही बेहद खतरनाक है वह मौहल्ले तक घुसने का साहस करता है। टाइगर रिजर्व की शरहद के बाहर जिन भी आदमखोरों की चर्चा है ,वह गुलदार ही हैं।

shobhna upadhyay's photography
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वहीं भारत तथा देश के बाहर भी वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी में ख्याति लब्ध शोभना उपाध्याय जिन्होंने 90 से अधिक बाघों के शानदार चित्र लिए हैं उनके व्यवहार का अध्ययन किया है। बताती हैं, बाघ की हममें कोई रुचि नहीं है और न हीं उसे मनुष्य का मांस स्वादिष्ट लगता है। बाघ पहले चरण में कभी आदमखोर नहीं होता व्यक्ति पर हमला कर उसे मारकर जब वह छोड़ जाता है तो यह इस बात का संकेत है की जरूर हमने कोई गलती की होगी .. जो बाघ को नागवार गुजरी होगी।

बाघों की बढ़ती संख्या और घटते जंगल वन्य जीव संघर्ष का मुख्य कारण हैं।
बाघ अमूमन अकेले रहता है और 40 से 60 वर्ग किलोमीटर का दायरा उसका अपना होता है। इस क्षेत्र में तीन बाघिन भी रह सकती हैं, मनुष्य की दखलअंदाजी बाघ को पसंद नहीं, दूसरा बडा कारण भारत के जंगलों में बढ़ रही लैंटाना घास है, जिसने न केवल बाघो के स्वच्छ विचरण में बाधा पैदा की है, बल्कि बाघों के भोजन में भी समस्या पैदा की है। लैटाना घास खाने के कारण बाघ के शिकार जानवरो का मांस अधिक खट्टा हो गया है, जिस कारण बाघ और गुलदार बीमार पड़ने लगे हैं, उनका व्यवहार बदला है वह हिंसक हो रहे हैं।
फिर भी वन्य-जीव संघर्ष का समाधान बाघो के शिकार में नहीं है, हमें बाघो के साथ सह अस्तित्व के अपने पुराने दर्शन को पुनर्परिभाषित करना चाहिए … जंगलों से पहले एक बफर जॉन जहां जानवरों की शांति भांग ना हो बनाना ही चाहिए । वन्य जीवन में हो रहे व्यापक बदलाव पर नए वैज्ञानिक शोध करने चाहिए, खुद को और बाघों को बचाते हुए साथ -साथ रहना हमें सीखना ही होगा, सह अस्तित्व का हमारा इतिहास है इसे हमें बहाल करना होगा, यह हम सब की जिम्मेदारी है।

– प्रमोद साह

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