विश्वविद्यालय में आयोजित बैठक में बनाई नई रणनीति
पंतनगर। गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर अब अपनी आय बढ़ाने के लिए सिर्फ फीस और स्ववित्तपोषित सीटों पर निर्भर नहीं रहेगा। विश्वविद्यालय की कोशिश है कि उसके शोध, तकनीक, प्रयोगशालाओं, कृषि भूमि, विशेषज्ञता और तैयार उत्पादों को कमाई के नए माध्यमों से जोड़ा जाए। इसके लिए विश्वविद्यालय में आय को दोगुना करने की रणनीति पर मंथन किया गया है। खास बात यह है कि इसका सीधा असर ’’छात्रों, किसानों, युवाओं और उद्योग जगत’’ पर पड़ सकता है।
गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में कुलपति डॉ. शिवेन्द्र कुमार कश्यप के साथ विभिन्न महाविद्यालयों के अधिष्ठाता, निदेशक और अनुसंधान केंद्रों के अधिकारी मौजूद रहे। बैठक में अन्ना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. के. शंकरन ने भी विश्वविद्यालय की आय बढ़ाने को लेकर सुझाव दिए। बैठक में सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि आखिर विश्वविद्यालय अपनी क्षमता का बेहतर इस्तेमाल कर अतिरिक्त आय कैसे पैदा करे? विश्वविद्यालय के पास बड़े स्तर पर ’’शोध, प्रयोगशालाएं, कृषि भूमि, तकनीकी विशेषज्ञता, पेटेंट, प्रशिक्षण क्षमता और विभिन्न कृषि एवं अन्य उत्पाद’’ मौजूद हैं। अब इन्हें सिर्फ अकादमिक गतिविधियों तक सीमित रखने के बजाय व्यावसायिक उपयोग से जोड़ने की तैयारी है।
अगर यह योजना जमीन पर उतरती है तो इसका फायदा केवल विश्वविद्यालय की आय बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगा। इससे किसानों को नई कृषि तकनीक और बेहतर बीज मिल सकते हैं, युवाओं को नए कौशल आधारित प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर मिल सकते हैं और उद्योगों को शोध एवं तकनीकी सेवाएं उपलब्ध हो सकती हैं।
कृषि महाविद्यालय की ओर से जैव उर्वरक, मृदा एवं खाद्य परीक्षण, प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रम, परामर्श सेवाओं और विश्वविद्यालय के उत्पादों की बिक्री के जरिए आय बढ़ाने की संभावनाएं बताई गईं। वहीं पशु चिकित्सा महाविद्यालय ने पेट एनिमल सेवाओं, डायग्नोस्टिक तकनीकों, खनिज मिश्रण, वन हेल्थ और कौशल आधारित पाठ्यक्रमों को आय के संभावित स्रोत के रूप में सामने रखा। प्रौद्योगिकी महाविद्यालय की सेमीकंडक्टर सेंटर और 5जी लैब जैसी आधुनिक सुविधाओं को भी प्रशिक्षण, अनुसंधान और तकनीकी सेवाओं के लिए इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया। कृषि व्यवसाय प्रबंधन महाविद्यालय ने उद्योग प्रायोजित सीटों, एग्री-बिजनेस पाठ्यक्रमों और इंडस्ट्री आधारित परियोजनाओं के विस्तार का सुझाव दिया।
वहीं मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय ने गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज और फिंगरलिंग उत्पादन बढ़ाकर आय में इजाफा करने की संभावनाएं बताईं। विश्वविद्यालय फार्म की कृषि भूमि का बेहतर इस्तेमाल, उच्च मूल्य वाली फसलों और बीज उत्पादन को बढ़ावा देना, फसल प्रसंस्करण तथा कृषि विज्ञान केंद्रों और शोध केंद्रों के माध्यम से आय बढ़ाना भी रणनीति का हिस्सा होगा।
विशेषज्ञ डॉ. शंकरन ने कहा कि विश्वविद्यालय को केवल आय बढ़ाने का लक्ष्य नहीं रखना चाहिए, बल्कि शोध और बौद्धिक संपदा में निवेश कर तेज और गुणात्मक विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने बाजार सर्वेक्षण, प्रोटोटाइप तैयार करने, तकनीक हस्तांतरण, रॉयल्टी मॉडल और छात्रों तथा शिक्षकों के स्टार्टअप को बढ़ावा देने की जरूरत बताई।वहीं, कुलपति डॉ. शिवेन्द्र कुमार कश्यप ने भी साफ किया कि विश्वविद्यालय की असली ताकत उसकी ’’बौद्धिक क्षमता और बौद्धिक संपदा’’ है। यानी अब विश्वविद्यालय का फोकस सिर्फ फीस से कमाई बढ़ाने पर नहीं, बल्कि अपने ’’शोध, तकनीक और विशेषज्ञता को बाजार से जोड़कर नए आय स्रोत तैयार करने’’ पर होगा। सवाल अब यह है कि विश्वविद्यालय की बढ़ी हुई आय का फायदा आम जनता तक कितनी तेजी से पहुंचेगा?
अगर शोध किसानों के खेत तक पहुंचे, तकनीक युवाओं को रोजगार दे, प्रयोगशालाएं आम लोगों और उद्योगों के काम आएं और विश्वविद्यालय के उत्पाद बाजार तक पहुंचें तो यह मॉडल पंतनगर के साथ-साथ पूरे उत्तराखंड के लिए मिसाल बन सकता है।

