खाली हो चुके गांव का दृश्य

इलाज को दवा नहीं, कर्ज लेकर चलाए जा रहे खर्चे समस्याओं का मारा जवां उत्तराखंड हमारा

उत्तराखण्ड ताजा खबर नैनीताल

विनोद पनेरू
हल्द्वानी। नौ नवम्बर 2017 को उत्तराखंड राज्य 17 साल का हो जाएगा। इन 17 सालों में विकास तो काफी हुआ है। तमाम संसाधन विकसित हुए, कई सुविधाएं भी पहले से बेहतर हुई हैं। मगर जवां उत्तराखंड समस्याओं से बुरी तरह घिरा हुआ है। अपनी युवावस्था की कगार पर पहुंचे राज्य के हालात कुछ ज्यादा ठीक नहीं हैं। इन 17 सालों में पलायन का सिलसिला नहीं थमा और गांव अब भी खाली के खाली होते जा रहे हैं। अब हाल के दिनों मेें स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि अपने उपचार के लिए भी राज्य के पास मरहम नहीं है। ऐसे में फिर वहीं सवाल कि राज्य बनने से जब बेरोजगारों को न रोजगार मिला न पलायन थमा, स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर नहीं हुई, शिक्षा व्यवस्था पटरी पर नहीं आ सकी तो आखिर विकास किसका हुआ।
नौ नवम्बर 2000 से पहले उत्तराखंड पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। बड़ा राज्य होने के चलते इस अंचल में सरकार समुचित ध्यान नहीं दे पाती थी। छोटे-छोटे कार्यो के लिए लोगों को लखनऊ की दौड़ लगानी पड़ती थी उसके बाद भी कार्य हो जाएं इसकी कोई गारंटी नहीं। ऐसे में क्षेत्र के समुचित विकास के लिए लोगों में अपने राज्य अपनी सरकार की भावना आई और राज्य के लिए आंदालन शुरू किया गया। कई शहादतों व संघर्षो के बाद नौ नवम्बर 2000 को अपना राज्य बना। तब इसका नाम उत्तरांचल रखा गया। कुछ समय तक राज्य में नाम को लेकर ही स्थिति साफ नहीं हुई तो बाद में इसका नाम उत्तराखंड ही रखा गया। नाम के संकट से छुटकारा मिला तो राज्य पहचान के लिए छटपटाने लगा। बारी-बारी से सत्ता परिवर्तन के तहत सत्तासीन हुए नेताओं ने अपने मनमाफिक विकास को लेकर वादों और घोषणाओं की झड़ी लगानी तो शुरू की। हालांकि विकास के कई आयाम भी स्थापित किये गए। बिजली, पानी, सड़क की सुविधा भी बंेहतर करने के प्रयास किये गए। लेकिन राज्य अब जवां हो चुका है। वह 17 साल पूरे कर चुका है। ऐसे में आज भी वह उन्हीं समस्याओं से घिरा हुआ है जिसके लिए उसके गठन को लेकर जबदस्त संघर्ष हुआ था, जन आंदोलन किये गए। लोगों को पुलिस की लाठियां खानी पड़ी, कईयों को जान गंवानी पड़ी। राज्य में आज भी दूरदराज के गांवों में न सड़क है, न बिजली, पानी की समुचित व्यवस्था। नगरी क्षेत्रों या जनप्रतिनिधियों के क्षेत्रों में तो काफी हद तक सुविधाएं बेहतर हो चुकी हैं। मगर आम आदमी या ग्रामीण आज भी उसी हाल में जी रहा है। स्वास्थ्य सुविधाएं न होने के कारण दूरदराज के ग्रामीण उपचार के लिए हल्द्वानी आते हैं मगर कई रास्ते में ही दम तोड़ जाते हैं क्योंकि सड़क व अच्छे सम्पर्क मार्ग न होने के चलते वे समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते। वहीं पलायन पहले भी गंभीर समस्या थी, राज्य बनने के बाद इसमें रोक लगने के बजाय इसमें इजाफा ही हुआ है। युवा मामूली पगार की नौकरी की खातिर शहरों में धक्के खा रहा है। अस्थायी नौकरी कब छूट जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलना नामुमकिन सा हो गया है। पहले भर्ती होती नहीं, हुई तो किसी न किसी वजह से वर्षो तक नियुक्ति की राह नहीं खुल पाती। कहने तो पंतनगर में सिडकुल स्थापना के शुरूआती वर्षो में कुछ हद तक युवाओं को रोजगार तो मिला मगर अस्थायी या श्रमिक के पदों पर ही। उच्च पदों पर वहां भी बाहरी युवाओं को रखा जाने लगा। हालांकि अब लम्बे समय से मंदी की मार के चलते वहां भी स्थानीय युवा वर्ग के लिए रोजगार न के बराबर रह गया है। सरकारों ने योजनाएं तो तमाम बनाई मगर स्वरोजगार स्थापित करने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए, इससे जवां उत्तराखंड के युवा हताश और निराश हो रहे हैं। वहीं अब संसाधनों को विकसित करने के लिए सरकार के पास पर्याप्त बजट भी नहीं है। अधिकांश बजट सरकारी कर्मियों के वेतन, भत्तों व जनप्रतिनिधियों की फिजुलखर्ची में ही व्यय हो रहा है। केंद्र से कर्ज लेकर सरकार चलाई जा रही है। ऐसे में समस्या ग्रस्त जवां उत्तराखंड की बेहतरी किस तरह हो पाएगी और युवा सपने बगैर पलायन कैसे पूरे होंगे यह बड़ा सवाल है।

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