हल्द्वानी। आज हम बात करेंगे उत्तराखंड के उस लोकपर्व की, जो केवल एक त्योहार नहीं बल्कि प्रकृति, हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाली हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। हम बात कर रहे हैं ’’हरेला पर्व’’ की। उत्तराखंड में हर वर्ष ’’श्रावण संक्रांति’’ के अवसर पर हरेला पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से कुमाऊं क्षेत्र का प्रमुख लोकपर्व है, लेकिन अब पूरे उत्तराखंड में इसे बड़े स्तर पर मनाया जाने लगा है। हरेला शब्द का अर्थ है ’’हरियाली’’। यह पर्व अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है।हरेला बोने की परंपरा पर्व से लगभग ’’9 से 10 दिन पहले’’ शुरू होती है। घरों में मिट्टी से भरे पात्र में गेहूं, जौ, धान, मक्का, तिल, सरसों और उड़द जैसे सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। जब ये बीज अंकुरित होकर हरे-भरे हो जाते हैं, तब श्रावण संक्रांति के दिन इन्हें काटकर परिवार के बड़े-बुजुर्ग सभी सदस्यों के सिर पर रखते हुए सुख, समृद्धि और लंबी आयु का आशीर्वाद देते हैं।
वर्ष 2026 में हरेला बोने की तिथि 7 जुलाई 2026 मंगलवार को है। जबकि हरेला काटने और पर्व मनाने की तिथि 16 जुलाई गुरुवार को है।
हरेला बोने का पारंपरिक नियम
बाँस की डलिया, लकड़ी के पात्र या मिट्टी के बर्तन में साफ मिट्टी भरें।
उसमें 5 या 7 प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। सामान्यतः ’ गेहूँ, ’ जौ, मक्का, धान, उड़द (या गहत), तिल, सरसों आदि।
’ प्रतिदिन हल्का पानी छिड़ककर पूजा स्थल में रखा जाता है।
16 जुलाई को हरेला काटकर भगवान शिव-पार्वती की पूजा की जाती है।
परिवार के बड़े सदस्य हरेला को आशीर्वाद स्वरूप सभी के सिर और कानों पर रखते हैं तथा सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसी दिन पौधरोपण करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। हरेला केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है।
इस दिन उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में ’’वृहद पौधरोपण अभियान’’ चलाए जाते हैं। स्कूलों, सरकारी कार्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा हजारों पौधे लगाए जाते हैं।
आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब उत्तराखंड का हरेला पर्व हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
एक पौधा लगाना, उसकी देखभाल करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली बचानाकृयही हरेला का वास्तविक संदेश है।
तो आइए, इस हरेला पर्व पर हम सभी एक संकल्प लें
’’एक पौधा जरूर लगाएंगे, पर्यावरण बचाएंगे और उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति को आगे बढ़ाएंगे।’’

