हल्द्वानी। कुत्ते को वफादार जानवर माना जाता है। आम तौर पर हम कुत्ता पालते हैं तो वह हमारे घर का सदस्य बन जाता है। अब अगर आपका छोटा नौकरीपेशा परिवार है और सारे परिवार को एक साथ ट्रेन में बैठकर कहीं जाना हो तो यह बड़ी समस्या हो जाती है कि आखिर उस कुत्ते को किसके भरोसे छोड़कर जाएं या फिर उसे कैसे साथ ले जाएं। ऐसी ही समस्या से जालंधर की श्रीमती लक्ष्मी सिंह को भी गुजरना पड़ा। लक्ष्मी सिंह बनारस की रहने वाली हैं। उनका ससुराल पटना में है। पति जालंधर में नौकरी पर थे। इकलौता बेटा दिल्ली में बी.टेक कर रहा है। जालंधर में इस परिवार ने ब्रूनो नामक गोल्डन रिटीवर नस्ल का एक कुत्ता पाला हुआ था। इसी बीच इस परिवार के मुखिया का तबादला जालंधर से रायपुर (छत्तीसगढ़) हो गया। अभी छत्तीसगढ़ में जमने में भी समय लगना था। अब दिक्कत यह थी कि कुत्ते का क्या करें। लक्ष्मी सिंह को ब्रूनो से अगाध स्नेह था। ऐसी सलाह भी सामने आई कि कुत्ते को यहीं छोड़ दो। लेकिन लक्ष्मी सिंह ने साफ कह दिया कि वह अपने ब्रूनो को छोड़कर नहीं जाएंगी, भले ही उन्हें जालंधर में अकेला क्यों न रहना पडे़। अंत में फैसला लिया गया कि ब्रूनो को भी साथ ले जाया जाएगा और वह अपने मायके बनारस उसे लेकर जाएंगी। यह तो थी लक्ष्मी सिंह के ब्रनो के प्रति स्नेह की कहानी, पर हम यहां इस कहानी को लिखने का हमारा मकसद यह है कि अगर आपको भी कभी ऐसी स्थिति से गुजरना पड़े तो आपको अपने पालतू कुत्ते को रेल में ले जाने के लिए किन-किन स्थितियों से गुजरना पड़ेगा। अब शुरू होती है ब्रनो की जालंधर से बनारस तक की यात्रा। यात्रा की शुरुआती तैयारी में इस परिवार को पता चला कि जिस प्रकार से मनुष्यों को सफर करने के लिए रिजर्वेशन जरूरी है, उसी तरह कुत्ते को भी ले जाने के लिए कुछ खास प्रक्रिया है। बुकिंग बाबू ने बताया कि अगर कुत्ते को साथ ले जाना है तो रेलगाडी के समय से दो घंटे पहले आना होगा। इसके अलावा कुत्ते का मेडिकल सर्टिफिकेट और उसको यात्रा में साथ ले जाने वाले का आधार कार्ड चाहिए। यह जरूरी नहीं कि हर ट्रेन में कुत्ता ले जाने की व्यवस्था हो ही। कुछ खास ट्रेनों में ही यह व्यवस्था होती है, लिहाजा रिजर्वेशन भी उन्हीं ट्रेनों में मिलेगा। इसके अलावा अगर पीछे से पहले ही उस ट्रेन में कोई और कुत्ता आ रहा है तो इस स्टेशन से आपका कुत्ता नहीं चढ़ाया जाएगा, क्योंकि एक ट्रेन में एक ही कुत्ता ले जाने का प्रावधान है। इतना ही नहीं अगर उसी दिन सेना का कोई कुत्ता जाने वाला होगा तो सामान्य व्यक्ति के कुत्ता भेजने की पूर्व सूचना के बावजूद उसे कुत्ता ले जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके बाद इस परिवार ने पता किया कि किन-किन रेलगाड़ियों में कुत्ता ले जाने की व्यवस्था है तो मालूम पड़ा कि पंजाब मेल में इसकी व्यवस्था है तो परिवार ने इसी ट्रेन में अपना रिजर्वेशन करवाया गया। इसके बाद कुत्ता भेजने के लिए चीफ पार्सल सुपरिंटेंडेंट (सीपीएस) को लिखित आवेदन दिया गया। इस आवेदन में पीएनआर नंबर, यात्रा तिथि, रेलगाडी, कहां से कहां तक, मोबाइल नंबर आदि का जिक्र जरूरी है। इन औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद सीपीएस ने इसकी सूचना रेलगाडी शुरू होने वाले स्टेशन यानी अमृतसर को भेजी तब कहीं जाकर यह सुनिश्चित हो पाया कि ब्रूनो को ले जाया जा सकता है। कुत्ते को ले जाने के लिए दो घंटे पहले परिवार जालंधर स्टेशन पहुंच गया और क्लाक रूम में उसकी बुकिंग करवाई। यहां से बुकिंग रसीद दी गई और कुत्ते के पट्टे पर कहां से कहां तक जाएगा और ले जाने वाले का मोबाइल नंबर लिखना पड़ा। लंबे गाड़ी में चढ़ाने के बाद बीच-बीच में आकर कुत्ते को उसके कैबिन में आकर पानी-खाना देना पड़ता है, ताकि कोई कठिनाई न हो। अंत में गंतव्य यानी वाराणसी स्टेशन पर कुत्ता उतारा गया और चालान रसीद दिखाकर उसे रेलवे से हासिल किया गया और वहां से लक्ष्मी सिंह अपने मायके के लिए रवाना हुई। अब आप समझ ही गए होंगे कि अपने पालतू कुत्ते को अगर कभी ट्रेन में ले जाना हो तो किन-किन प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसलिए भविष्य के लिए इन जानकारियों को अपने दिमाग में बिठाकर रखिए। नोट यह लेख हमें पंच आखर डेस्क से पंच आखर के सम्पादक चंद्रशेखर बैंजवाल जी के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। अगर आपके पास भी है कोई लेख या समाजहित से जुड़ा मुददा जो आपके मन में उठ रहा है तो कलम चलाइए और हमेें मेल कीजिए

ब्रूनो की जालंधर से बनारस यात्रा

हल्द्वानी। कुत्ते को वफादार जानवर माना जाता है। आम तौर पर हम कुत्ता पालते हैं तो वह हमारे घर का सदस्य बन जाता है। अब अगर आपका छोटा नौकरीपेशा परिवार है और सारे परिवार को एक साथ ट्रेन में बैठकर कहीं जाना हो तो यह बड़ी समस्या हो जाती है कि आखिर उस कुत्ते को […]

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General-Science

स्कूल वाले डरते क्यों हैं

मैं एक छोटी सी बच्ची का अभिभावक हूं, जिसे अगले कुछ महीनों में स्कूल में दाखिल करवाना है चंद्रशेखर बैंजवाल हल्द्वानी। मैं एक छोटी सी बच्ची का अभिभावक हूं, जिसे अगले कुछ महीनों में स्कूल में दाखिल करवाना है। मगर मैं छह महीने पहले से ही इस चिंता में घुला जा रहा हूं कि उसके […]

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नौकायन करते सैलानी

पहाड़ की सभ्यता और संस्कृति पर पर्यटन कलंक से कम नहीं

खूबसूरती पर लग रहे गहरे दाग चंद्रशेखर जोशी हल्द्वानी। गर्मी का मौसम आते ही पहाड़ों तबाही शुरू हो जाती है। इस तबाही का बड़ा स्वागत होता है जनाब। सरकार से लेकर पूरा प्रशासनिक अमला पलक-पांवड़े बिछाए रहता है। व्यापारी लार टपकाते हैं। लफंडर मन मसोस कर देखे रहते हैं। मार्च से जून तक चार महीने […]

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रुदपुर डिवाइडर किनारे लगाए पौधै मुरझाये हुए

रुद्रपुर में सिंचाई के नाम पर लाखों डकारने के बाद भी डिवाइडर किनारे लगे पौधे सूखने की कगार पर

विनोद पनेरू रुद्रपुर। अपने बैंक खाते को नोटांें की गडिडयों से सींचने के बाद भी अफसरों की संवेदना नहीं जागी। जिन पौधों को लगाने, सिंचाई व देखभाल के नाम पर करीब 15 लाख से अधिक का बजट खपा दिया गया हो वे पौधे आज सिंचाई व देखरेख के अभाव मेें सूखने की कगार पर पहुंचे […]

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गन्ने का रस तैयार करतेा ठेला संचालक

यहां औषधि बिकती बीमारी के ठेलों में

ध्यान जरा भी डिग जाए तो मक्खियां पिसतीं गन्ने में चंद्रशेखर जोशी हल्द्वानी। मुझे दोष न देना पढ़ने वालो, गिनाऊं अगर में बीमारी। धूल भरी इन सड़कों पर दिनभर भट-भट करते इंजन हैं। ध्यान जरा भी डिग जाए तो मक्खियां पिसतीं गन्ने में। सौ मुंह जूठे गिलासों में देखो मिलता कैसा शीतल रस। नाली की […]

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सपने

तकलीफ देते सपने ! कभी दिल घबराए, कभी सोच में डूबे

सपने गर ज्यादा परेशान करें तो इनका इलाज जूता चंद्रशेखर जोशी हल्द्वानी। अच्छे दिखे तो पसीना छूटे, बुरे दिखे तो पैर कांपे। कभी दिल घबराए, कभी सोच में डूबे। जीवन की बहार चुराएं सपने। रातों की नीद उड़ाएं सपने। सपने गर ज्यादा परेशान करें तो इनका इलाज जूता। …ये रीत बहुत पुरानी है। गरीब और […]

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sidcul-rudrapur

पंतनगर सिडकुल में सुलग रही श्रमिक असंतोष की भयंकर चिंगारी, प्रबंधन को ले डुबेंगी लपटें

सिडकुल पंतनगर में श्रमिकांें के हालात कुछ ठीक नहीं हैं। काम का बोझ, नौकरी का भरोसा नहीं, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न की इंतहां। प्रबंधन और श्रम अफसरों की मिलीभगत से श्रम कानूनों की सरेआम धज्जियां। सर्दी, गर्मी में हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी ठेकेदार के आगे तनख्वाह के लिए गिड़गिड़ाना, यही नियति बन गई है […]

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तनुजा पनेरू

ऐ स्कूल मुझे जरा फिर से बुलाना

ऐ स्कूल मुझे जरा फिर से बुलाना कमीज के बटन ऊपर नीचे लगाना वो अपने बाल खुद का न बन पाना पीटी शूज को चैक से चमकाना वो काले जूतों को मौजे से पोछ जाना ऐ मेरे स्कूल मुझे फिर से बुलाना वो बड़े नाखूनों को दांत से चबाना और लेट आने पर मैदान के […]

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फाइल फोटो

शादी ब्याह मतलब गिरने का सीजन

हल्द्वानी। (चंद्रशेखर जोशी) मौसम दिल को लुभाने लगे तो कुछ लोग गिरने की तैयारी में जुट जाते हैं। कितना गिरेंगे खुद भी पता नहीं, कीचड़ का भी कोई अहसास नहीं। …शादी न हुई आफत हो गई। अपनी शक्ल जैसी भी हो लड़के को फैक्ट्री निर्मित लड़की चाहिए। अंग-अंग की चाहत ऐसी कि धरती पर खोज […]

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