kumauni bhasha 2 750x430 1 कुमाऊँनी भाषा के भविष्य, उपयोगिता और डिजिटल युग में प्रसार पर गहन चर्चा

कुमाऊँनी भाषा के भविष्य, उपयोगिता और डिजिटल युग में प्रसार पर गहन चर्चा

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रुद्रपुर। कुमाऊँ की समृद्ध भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन के दूसरे दिन शनिवार को कुमाऊँनी भाषा के भविष्य, उसकी उपयोगिता और डिजिटल युग में उसके प्रसार पर गहन चर्चा हुई।

यह ऐतिहासिक आयोजन उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून, कुमाऊँनी पत्रिका ‘पहरू’, कुमाऊँनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति तथा संस्कृति विभाग, उत्तराखण्ड के संयुक्त तत्वावधान में डायट सभागार, रुद्रपुर में जारी है।

दूसरे दिन के सत्र की शुरुआत कुमाऊँनी लोकगीतों की मधुर ध्वनियों के साथ हुई। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों और छात्र-छात्राओं की उपस्थिति से सभागार लोकसंस्कृति की जीवंत झलक बन गया।

वक्ताओं ने कहा कि कुमाऊँनी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व और स्वाभिमान की अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि जब तक मातृभाषा जीवित रहती है, तब तक संस्कृति भी सुरक्षित रहती है।वक्ताओं ने विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक कुमाऊँनी भाषा के अध्ययन-अध्यापन को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि नई पीढ़ी अपनी भाषाई जड़ों से जुड़ी रह सके।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म, यूट्यूब चैनल, शॉर्ट फिल्म, सिनेमा और संगीत के माध्यम से भाषा को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाया जाए। उन्होंने कहा कि तकनीकी माध्यमों से लोकभाषाओं को जोड़ने का समय आ गया है, जिससे उनका प्रभाव और पहुंच दोनों बढ़ सके।

सम्मेलन के दूसरे दिन “कुमाऊँनी भाषा का आधुनिक स्वरूप”, “लोकभाषा और सोशल मीडिया”, तथा “लोककला, रंगमंच और सिनेमा में कुमाऊँनी अभिव्यक्ति” जैसे विषयों पर भी विचार-विमर्श हुआ।वक्ताओं ने कहा कि लोकभाषा केवल परंपरा नहीं, बल्कि आधुनिक रचनात्मकता की आधारशिला भी है।

इस अवसर पर लोक कलाकारों ने कुमाऊँनी संस्कृति पर आधारित गीत और नृत्य प्रस्तुत किए, जिनसे सभागार देर तक तालियों की गूंज से गूंजता रहा।

मीडिया प्रभारी डॉ. के.सी. चंदौला ने बताया कि आयोजन के मुख्य प्रायोजक चंदौला होम्योपैथी मेडिकल कॉलेज और वसुंधरा नर्सिंग कॉलेज हैं। उन्होंने कहा कि रुद्रपुर जैसे औद्योगिक शहर में लोकभाषा पर केंद्रित यह आयोजन सांस्कृतिक चेतना के नवप्रस्फुटन का प्रतीक बनेगा।

कार्यक्रम में संयोजक डॉ. बी.एस. बिष्ट, सह-संयोजक डॉ. एल.एम. उप्रेती, हयात सिंह रावत, डॉ. किशोर चंदौला, भरत लाल शाह, लक्ष्मी चंद्र पंत, आनंद सिंह धामी, हेम पंत, महेश चंद्र जोशी, रमेश चंद्र जोशी, महेंद्र ठकुराठी सहित बड़ी संख्या में शिक्षाविद, लेखक, कलाकार और भाषा प्रेमी उपस्थित रहे।

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