लेखक चंद्रशेखर जोशी

सत्ता को ऐशो-आराम के लिए इस्तेमाल करने वाले आसमान से गिरते उल्का पिंडों की तरह

राजकाज समाज साहित्य

इनसे सीखेंः सच्चाई और सादगी में राजा हरिश्चंद्र और अबू बकर का जवाब नहीं
चंद्रशेखर जोशी
हल्द्वानी। सत्ता को ऐशो-आराम के लिए इस्तेमाल करने वाले आसमान से गिरते उल्का पिंडों की तरह चमकते हैं और विलीन हो जाते हैं। सादगी से राज करने वाले युगों तक चंद्रमा की तरह शीतलता देते हैं। हिंदुओं के राजा हरिश्चंद्र और मुस्लिमों के खलीफा अबू बकर सच्चाई और सादगी के लिए हमेशा जाने जाएंगे।
…राजा हरिश्चंद्र के युग और समय की सटीक जानकारी इतिहास में नहीं मिलती है। उनके जीवन काल और राज-काज के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। उनके जीवन की दर्जनों कहानियां समाज में आदर्श स्थापित करती हैं। जब भी अत्याचार बढ़ेंगे और सत्य की चर्चा होगी तो महान राजा हरिश्चंद्र को याद किया जाता रहेगा। उनके राज-पाट के बारे में केवल कहानियां ही प्रचलित हों, ऐसा जरूरी नहीं है। ऐसे राजा हुए भी होंगे। उन कथाओं को सुनने और समझने से लगता है कि उस दौर का समाज भी बेहद अत्याचारों से भरा रहा होगा। बड़ी आबादी तंगहाली का जीवन जी रही होगी। जनता को इस राजा ने बहुत राहत दी होगी। उनके बाद भी कुछ त्यागी और बलिदानी शासक हुए, जिन्हें समय-समय पर याद किया जाता है।
…समुद्र के उस पार नजर डालें तो एक संपन्न देश दिखता है अरब। इस रेगिस्तानी धरती के वैभव की नींव बेहद सादगी पसंद व्यक्ति ने रखी थी, उनका नाम था अबू बकर। बाद में वह खलीफा बन गए। खलीफा की हैसियत से वह धर्माध्यक्ष और बादशाह दोनों थे। इसके बाद भी वह बेहद सामान्य जीवन जीते थे। उनका ओहदा और राज्य दोनों बढ़ते गए, पर उन्होंने सादगी नहीं छोड़ी। उन्होंने इस्लाम के लोकतंत्र को जिंदा करने की कोशिशें की। जब उनके मातहत अमीर बनने लगे और रेशमी लिबास ओढने लगे तो अबू बकर उन्हें सजा देते थे। उन्होंने सभी को त्याग का जीवन जीने की नसीहतें दीं। शासन व्यवस्था में अबू बकर ने मोहम्मद साहब की गरीबी और न्याय के सिद्धांतों का पालन किया। अबू बकर का कोई राजकीय कोष नहीं था। जनता से कर आते ही उसे जनता के हित में खर्च कर दिया जाता था। वह अपने लिए बहुत कम रकम लिया करते थे। दो साल के शासन में अपने पर खर्च हुए धन को उन्होंने मृत्यु से पहले ही अपनी निजी संपत्ति को बेचकर कोष में वापस कर दिया था। इस्लाम के यह पहले खलीफा ज्यादा समय नहीं रह पाए। बादशाह बनने के दो साल बाद ही वह मर गए। उनकी सत्ता उमर ने संभाली। उमर बाहर के लिए कठोर और जन सामान्य के लिए बेहद नरम थे। वह कहा करते थे कि यदि हमने ईरान के दरबारों जैसी शान-ओ-शौकत अपना ली तो अरब लोग नीचे गिर जाएंगे। उन्होंने इस्लाम को नई ऊंचाइयां दीं। उनके दस साल के शासन में अरब साम्राज्य यरूशलम से सीरिया, ईरान, इराक तक फैल गया। असल में अरबियों की यह एकता विश्व पटल पर गजब तरीके से उभरी।
…ऐसा कहते हैं कि रेगिस्तान के निवासी लंबे समय तक घुमक्कड़ जीवन बिताते रहे। जब यूरोप में कई सल्तनतें कायम हो कर खत्म हो चुकी थीं और भारत के आसपास की धरती पर भांति-भांति के राजा राज कर चुके थे, तब भी अरब के लोग बिना किसी परिवर्तन के जीवन बिताते रहे। अरब के जहाज दूर-दूर तक व्यापार करते और वापस लौट कर आ जाते थे। अरबी लोग अपने खानदानों में ही रहते थे और इनके एक-दूसरे के साथ झगड़े हुआ करते थे। साल में एक बार सभी लोग झगड़ों की सुलह करने के लिए मक्का जाकर जियारत करते थे, फिर अपने-अपने झुंडों में चले जाते थे। ज्यादातर कबीले मक्का में 360 प्रतिमाओं की उपासना करते थे। यही प्रतिमाएं सुलह-समझौते की साक्षी मानी जाती थीं।
…मक्का में 570 ई. में पैगंबर मोहम्मद का जन्म हुआ। इन दिनों अरब समाज का पूरा जीवन इन प्रतिमाओं के इर्द-गिर्द ही चल रहा था। आसपास के राज्य उन्नति कर रहे थे, यहां के लोगों का जीवन कई संकटों से घिरा था। मोहम्मद साहब जब बड़े हुए तो इन बुराइयों के खिलाफ बोलने लगे। वह अन्याय-अत्याचार के खिलाफ उपदेश दिया करते थे। मक्का में उनको खूब इज्जत मिलने लगी। उन्होंने कहा, खुदा एक है, इन प्रतिमाओं का कोई अर्थ नहीं है। कुछ समय बाद मक्का के लोग ही उनके खिलाफ हो गए और उन्हें भगा दिया। मक्का से उनके जाने को अरबी लोग हिजरत भी कहते हैं। तब मोहम्मद साहब करीब 52 साल के रहे होंगे। तभी से मुसलमानी हिजरी सन् भी शुरू हुआ था।
…जब मोहम्मद साहब को अपने ही लोगों ने भगा दिया तो वह अपने परिचितों के पास कुछ दूर के शहर यथरीब चले गए। यहां उनका बेहद स्वागत हुआ। उनके नाम पर ही इस शहर को मदीन-उन-नबी यानि नबी का शहर कहा जाने लगा, बाद में यह मदीना कहा गया। उन्होंने आपस में लडने वाले कई कबीलों को एकजुट कर दिया। सभी से शांति और भाईचारे के साथ रहने को कहा। उन्होंने इन कबीलों में एकता के लिए अजब जोश भर दिया। अबू बकर, मोहम्मद के प्रमुख अनुयायी थे। शायद उनके रिश्तेदार भी थे। 632 ई. में मोहम्मद साहब की मृत्यु हो गई। तब तक बहुतेरे कबीले एक हो चुके थे। मोहम्मद की मौत के बाद मदीना के कई कबीलों ने एक सभा की। यह सभा कई दिनों तक चली। इसमें कई विवाद भी हुए और अंत में सभी ने अबू बकर को पैगंबर का खलीफा यानि उत्तराधिकारी मान लिया। इसके बाद अबू बकर धर्माध्यक्ष और बादशाह दोनों बन गए। दो साल के उनके शासनकाल में त्याग के कई किस्से हैं। कहा जाता है कि वह फिजूलखर्ची के सख्त खिलाफ थे। खैर अबू बकर और उनके बाद उमर का शासनकाल यादगार बना। इसके बाद कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन अरबियों की एकता कभी नहीं टूटी और देश विकास करता चला गया।
…कालांतर से अब तक सादगी पसंद राष्टृाध्यक्षों ने देश और समाज को आगे बढ़ाया। ऐशो-आराम करने वालों के नाम पूरे समाज की बर्बादी की कहानियां रहीं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, हल्द्वानी में रहते हैं।
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