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शादी ब्याह मतलब गिरने का सीजन

नैनीताल मेरी कलम से साहित्य

हल्द्वानी। (चंद्रशेखर जोशी)
मौसम दिल को लुभाने लगे तो कुछ लोग गिरने की तैयारी में जुट जाते हैं। कितना गिरेंगे खुद भी पता नहीं, कीचड़ का भी कोई अहसास नहीं।
…शादी न हुई आफत हो गई। अपनी शक्ल जैसी भी हो लड़के को फैक्ट्री निर्मित लड़की चाहिए। अंग-अंग की चाहत ऐसी कि धरती पर खोज पाना संभव नहीं। जो चीज खुद नहीं जुटा पाया, अब ससुराल से पूरी करेगा। मां-बाप को लड़की वालों से सबकुछ चाहिए। हालांकि डिमांड की कल्पना औकातानुसार ही होती है। अगर इनकी कुल मांग को जोड़ लिया जाए और शादी का खर्च उसमें से घटा दिया जाए तो घर आया माल अधिकतम तीन-चार महीने की कमाई के बराबर ही होता है। इस अतिरिक्त कमाई की ख़ातिर इस हद तक गिरेंगे की अच्छा खासा संबंध पहले दिन ही हमेशा के लिए बिगड़ जाएगा।
…लड़की वालों को लड़का धनवान चाहिए। इनका बस चले तो कितने ही बड़े घर में रिश्ता पक्का कर आएं, भले ही जवाई को दुबारा घर न बुला सकें, कभी लड़के वालों से सिर उठाकर बात न कर पाएं।
…बारातियों का तो हाल ही बुरा, सड़क पर जो हुआ सो हुआ, पंडाल के भीतर भी अजब होता है। लगता है न जाने कब से भूखे थे। थाल पूरी भर लेंगे चाहे आधा फेंकना पड़े। स्वास्थ्य ठीक न रहता हो, पर सब कुछ खाएंगे। हर चीज में खोट निकालना दो घंटे के लिए अधिकतर की फितरत में शामिल हो जाता है।
…लड़की पक्ष के लोग बेवजह की खातिर में जुटे रहते हैं।
एक-दो आदमियों को रजिस्टर थमा कर कुर्सी पर ऐसे बैठा दिया जाता मानो मंडी में आढती के मुंशी। इस काम में मुंशी भी मालिक का खास वफादार होने का गर्व महसूस करते हैं। इसके बाद का महत्वपूर्ण पद शराब का कोटा संभालने वाले का होता है। वैसे तो समाज में शराब बांटने वाले को बुरी नजर से देखा जाता है, पर बारात में इसका पद बेहद सम्मानित माना जाता है।
…ठंड कितनी ही हो कुछ महिलाएं स्वेटर तक नहीं पहन देतीं, भले ही एक हफ्ता बिस्तर पर गुजारना पड़े। दुल्हन को ऐसा बना देंगे मानो प्लास्टिक की गुड़िया। अगर अचानक शीशा दिखा दिया जाए तो बेटी अपने को खुद न पहचान पाए। इसमें अधिकतर व्यूटी पार्लर वालों की अक्ल ही काम करती है। मां-बाप, रिश्तेदार इंतजार करते परेशान हो जाएंगे पर रुपए ऐंठने के चक्कर में बेहुदा श्रंगार कराने वाली टीम घंटों दुल्हन को बैठाए रखती हैं।
…शादियों का सबसे बड़ा किरदार फोटोग्राफर होता है। सारे आयोजन इसी के दिशा निर्देशन में होते हैं, धार्मिक कार्य भी जब तक यह व्यक्ति ओके न कह दे, तब तक न शुरू होते हैं और न खत्म। धर्मगुरुओं की भी इस आयोजन में कोई नहीं सुनता, लिहाजा वे भी हर पल रुपयों पर नजर जमाए रहते हैं।
…जीवन के सबसे सुंदर रिश्ते का मुख्य चरण इस कदर आडंबरों में घिरा कि अब इसकी याद आते ही हर व्यक्ति तनाव में आ जाता है।

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