खेत में खड़ी फसल

नरेंद्र के वैज्ञानिक काम को नहीं मिल रही पहचान

ताजा खबर

गौलापार के किसान गेहूं की उन्नत प्रजाति कर चुके हैं तैयार
नाम पेटेंट कराने को सिस्टम नहीं दिखा रहा फुुुर्ती
किसान श्री अवार्ड भी पा चुके हैं नरेंद्र

विनोद पनेरू, हल्द्वानी। आम तौर पर खोज एवं अनुसंधान का काम वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का होता है। मगर गौलापार के प्रगतिशील किसान नरेंद्र सिंह मेहरा ने खेत से गेहूं के एक अलग तरह के पौध कों पारखी नजर से देख उसका बीज तैयार कर डाला। नतीजा यह हुुआ कि एस अलग तरह के गेहू बीज से जब गेहूं उगाया गया तो सामान्य प्रजाति से उत्पादन में इजाफा देखने को मिला। विशेषज्ञों ने भी मौके पर आकर अधिक उत्पादन की बात स्वीकारी आसपास के किसान भी इसी बीज को बोकर अधिक उत्पादन ले रहे हैं। मगर वर्षो बीत जाने के बाद भी उन्न्त किस्म की इस गेहूं की प्रजाति को आजतक नाम नहीं मिल पाया है। किसान मेहरा इस बीज को नरेंद्र-09 नाम देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन उन्हें जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों व विशेषज्ञों का विशेष सहयोग नहीं मिल पा रहा है। हालांकि उन्हें उम्मीद है कि जल्द वे इस गेहूं प्रजाति को अपने नाम कराने में कामयाब होंगे। प्रगतिशील किसान नरेंद्र सिंह मेहरा देवला मल्ला, गौलापार हल्द्वानी के रहने वाले हैं।

कुमाऊं विश्वविद्यालय से भूगोल से एमए करने के बाद टूरिज्म का कोर्स किया। कुछ समय नौकरी भी की। लेकिन शुरुआत से ही सहकारिता व खेती किसानी में रुचि के चलते उन्होंने खेती करनी शुरू कर दी। वे लम्बे समय तक दुग्ण समितियों से भी जुड़े रहे। 1991 में दुग्ध उत्पादकों की दाम बढ़ाने की मांग के लिए भी आंदोलन किया और उचित मूल्य दिलाने में सफल रहे। किसान नरेंद्र सिंह बताते हैं कि 2009 में उन्होंने खेत में आरआर-20 प्रजाति का गेहूं बीज बोया। जब फसल तैयार होने का वक्त आया तो देखा कि एक पौध अलग ही नजर आ रहा है उसमें अधिक कल्ले होने के साथ ही गेहूं के दाने भी अधिक दिखाई दिये। इस पर उन्होंने इस पौध के दाने अलग से रख लिये और अगले साल बीज के लिए रख लिया। जब इसी बीज से गेहूं अलग से बोया गया तो परिणाम चैकाने वाले थे। अलग पौध से तैयार बीज से पैदा गेहूं का उत्पादन तो अलग था ही साथ ही पौध की लम्बाई व अधिक कल्ले भी थे। इसके बाद जानकारी होने के बाद आसपास के किसान भी नए बीज को लेकर गए और पाया कि सामान्य बीज की तुलना में इस बीत से तैयार बीज से अधिक उत्पादन हो रहा है। बताते हैं कि 2013 में हल्द्वानी में किसान सम्मेलन हुआ था। उसमें वे बीज लेकर गए तो विभागीय अधिकारियों ने उनकी सराहना की। इसी उपलब्घि पर 2015-16 में किसान श्री अवार्ड भी दिया गया। कहा कि तब उन्होंने इस बीज को नरेंद्र-09 नाम दिया था। कृषि विभाग अधिकारियों ने भी मौका मुआयना कर बीज का सैंपल लेकर बीज को उनके नाम कराने का भरोसा दिया था। बीज को पंत विवि के विशेषज्ञों के पास भी भेजा गया था। लेकिन नरेंद्र की पीड़ा यह है कि वैज्ञानिकों का काम करने के बाद भी उनके द्वारा खोजे गए गेहूं के बीज को नाम नहीं मिल पाया है। वे बीज को अपने नाम पर पेटेंट कराना चाहते हैं और लगातार संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन सिस्टम फुर्ती नहीं दिखा पा रहा है। इससे किसान श्री अवार्ड प्राप्त किसान सम्मान और बीज को पेटेंट कराने के लिए सरकार और सिस्टम के उदार रवैये की राह देख रहा है। अब देखना है सरकार और सम्बधी विभाग से जुड़े अधिकारी किसान की खोज को नाम दिलाने में कब पहल करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.