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डा. भीमराव अंबेडकर ने सिखाया था समाज को एक हो जाना

उत्तराखण्ड मन की बात मेरी कलम से

फूट डालकर राज करने वालों को मुंहतोड़ जवाब मिलना चाहिए
श्याम दत्त पांडे
हल्द्वानी। जिस प्रकार चोर को चांदनी रातें नहीं सुहाती हैं, उसी तरह राजनैतिज्ञों को सर्वत्र सुख, चैन, अमन, भाईचारा नहीं सुहाता है। एक प्राचीन कहावत है नाम कमाने या शार्टकट का आसान तरीका क्या है, चैराहे पर गंदगी उत्पन्न कर दो, खाई खोद दो, चैराहे पर सार्वजनिक शौचालयों पर नेताओं के नाम के पत्थर लगवाकर, नेता, अभिनेता, इसी माध्यम से सुर्खियों में बने रहना चाहते हैं। हमारे देश में जिस महापुरुष के नाम पर राजनीति होती है वे डा. भीमराव अंबेडकर।

श्याम दत्त पांडे
श्याम दत्त पांडे

डा. अंबेडकर का तर्क इस प्रकार है- यदि शरीर का एक भाग रोगग्रस्त या दुर्घटनाग्रस्त हो जाए तो इसका सीधा दुष्प्रभाव उसी अंग तक सीमित नहीं होता है। बल्कि सम्पूर्ण शरीर पर उसका समान प्रभाव पड़ता है। यदि परिवार में एक व्यक्ति रोगग्रस्त अथवा दुर्घटनाग्रस्त हो जाए ता सम्पूर्ण परिवार का सुख चैन छीन जाता है। पूरे परिवार व शरीर का स्वस्थ व सुरक्षित रहना अनिवार्य है। सौर परिवार में जितने ग्रह हैं कोई भी परिवर्तन हो तो सौर मंडल के समस्त ग्रहों पर उसका समान प्रभाव पड़ता है। शरीर के अंग अनुशासित होकर आपस में अपना काम करते हैं, कभी आपस में लड़ते नहीं हैं।
डा. अंबेडकर ने समाज को दूध और पानी की तरह मिलाकर एक हो जाना सिखाया था, न कि तेल और पानी की तरह अलग हो जाना। इसी आदर्श व मजबूत नींव के सहारे हजारों वर्षो से हमारी संस्कृति टिकी है। सिर का स्थान ऊपर होते हुए भी उसे मजबूत नींव रुपी चरणों पर झुकना पड़ता है। यदि उनके आदर्शो को हम व्यवहार में लाते हैं तो उनके नाम के सारे विवाद खत्म हो जाते। धर्म की वास्तविक क्षति धर्म के ठेकेदारों द्वारा हुई न कि नास्तिकों द्वारा बाबा साहेब के अनुयायी उनके नाम पर सुर्खियां बटोरना चाहते हैं। उनकी प्रतिमा के नीचे उपरोक्त उनके आदर्श वाक्य भी अंकित होने चाहिए। अतः फूट डालकर राज करने वालों को मुंहतोड़ जवाब मिलना चाहिए। देश को बाहरी आक्रमणों की अपेक्षा आंतरिक नासूर रूपी फूट से सर्वाधिक क्षति उठानी पड़ी। उस समय डा. अंबेडकर पर विदेशी मिशनरियांें ने अपना प्रभाव बढाना चाहा था। यदि अंबेडकर अपने लाखों अनुायायियों के साथ मुसलमान या इसाई बने होते तो आज स्थिति विकट होती। उस महापुरुष को पहचानने में हमने देरी कर दी। उस दिवंगत आत्माा के हम ़ऋणी हैं। दो पड़ोसी आपस में लड़ते रहते थे। एक बार उन्हें पता चला कि लाहौर में हमारे पुरखे अच्छे पड़ोसी थे, उन्होंने काफी संघर्ष किया था। नियति ने हमें भी अमेरिका में पड़ोसी बना दिया। अज्ञानता मिटते ही सारी कड़वाहट समाप्त हा गयी। आदिवासी, वनवासी, निर्बल वर्ग के उत्थान के लिए किये गए प्रयास राम राज्य के प्रतीत हैं।

भीमराव अंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य पर लेखक के विचार
लेखक श्याम दत्त पांडे, स्यालटीट, गरुड़, बागेश्वर निवासी हैं। हाल में तीन पानी, हल्द्वानी में रहते हैं।

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