पढ़ने की उम्र में झाडू उठाने को मजबूर बच्चा

अब उठा ले मेरे बच्चे हमारा खानदानी झाडू़

उत्तराखण्ड मन की बात मेरी कलम से

समाज की हर जिद सहन करना इस प्यारे बच्चे का फर्ज बना
चंद्रशेखर जोशी
हल्}ानी। 17 साल का सोनू 10 दिन पहले तक जरा जिद्दी था। अब समाज की हर जिद सहन करना इस प्यारे बच्चे का फर्ज बना। इंटर की परीक्षा देकर वह इस शहर की सेवा करेगा। इसके बदले हर पल अपमान, जलालत झेलेगा।
…सोनू की जिद थी कि वह इस काम को नहीं करेगा। एक साल पहले मोहल्ले के लड़कों ने उसे काम पर ले जाना चाहा पर वह लड़ गया, लेकिन काम करने नहीं गया। सोमपाल का वह इकलौता बेटा है। 45 साल में ही सोमपाल को गंभीर बीमारी पकड़ गई है। दो साल पहले जब सोनू 10वीं में था तो वह पापा से नाराज हो गया। बोला बाबू तुम पी कर मत आना। सोमपाल ने कहा कि आज एक पोस्टमार्टम किया बेटा, मरे हुए आदमी को चीरना-फाडना बहुत बुरा होता है। हमारे खानदान के हिस्से ऐसे काम आए कि इनको बिन पिए किया नहीं जा सकता और इन कामों को करने के बाद बिना पिए नींद नहीं आ सकती। सोनू को पता था कि उसके पिता नगर निगम में सफाई करते हैं। आज उसे पता चला कि वह मरे लोगों की चीरफाड़ भी करते हैं। उसने मन ही मन ठान ली कि वह पढ़ाई करेगा। कोई भी दूसरा काम कर लेगा पर सफाई का काम नहीं करेगा।
…उसने मां से भी कहा कि वह लोगों के घरों में सफाई करने न जाया करे, पर वह कह देती कि बेटा जब तू कमाने वाला हो जाएगा तो मैं घर पर ही रहूंगी। तीन महीने पहले जनवरी का कड़क जाड़ा था। सोनू मस्ती के मूड में था। घर का कमरा सीलन से बदबू मार रहा था, जलाने के लिए कोयले, लकड़ी भी नहीं थे। मां-बाप दोनों काम पर निकल गए थे। मोहल्ले के तीन युवक ट्रैक्टर लेकर जा रहे थे तो सोनू भी उनके साथ हो लिया। रास्ते में उन्होंने ट्रैक्टर पर एक टैंकर भी बांध लिया। हंसी-मजाक करते हुए चार लड़के करीब सात-आठ किलोमीटर दूर पहुंचे।
…एक मकान के बाहर ट्रैक्टर खड़ा करते ही भयानक दुर्गंध आने लगी। एक युवक ने जोर से आवाज लगाई सोमपाल। हां भाई कहते हुए गड्ढे से हाथ में गंदगी भरी बाल्टी के साथ एक काली काया बाहर को झांकी। सोनू और सोमपाल की नजरें मिलीं। दोनों बाप-बेटे एक दूसरे को देख अपनी ही जगह पर दफन हो जाने को तैयार। एक-दूसरे से कुछ कह पाने का दम नहीं बचा। ये धरती कहीं से फट जाए तो सोमपाल बेटे को गोद में रख आंखें बंद कर ले। उसके हाथ से गंदगी भरी बाल्टी गिर पड़ी और गटर में सने पैर पर जा गिरी। चीख सुनकर तीनों लड़के गटर में गए और जैसे-तैसे सोमपाल को बाहर निकाला। चोट उसके पैर पर नहीं दिल पर लगी थी।
…चारों लोग सोमपाल को लेकर अस्पताल की ओर जाने लगे तो मकान मालिक ने रोक लिया। वह बोला कि गटर खुला छोड़कर नहीं जा सकते हो। चारों उसे बाबू जी बाबू जी कह कर समझाते रहे पर वह नहीं माना। तय हुआ कि दो लड़के सोमपाल को लेकर अस्पताल जाएंगे और दो गंदगी साफ करेंगे। यही हुआ। सोनू भी बाप के साथ अस्पताल की ओर बढ़ गया। इस हालात में अस्पताल जाना संभव नहीं था। सरकारी अस्पताल में पानी की उम्मीद भी नहीं थी तो सोमपाल को पहले एक नदी किनारे ले जाया गया। उसे ठंडे पानी से नहलाया, कपड़े साफ किए और तब अस्पताल ले गए। पैर में ज्यादा चोट नहीं थी पर सोमपाल में अब खड़े रहने की ताकत भी न थी। डाक्टर ने घर को भेज दिया।
…ये जिद्दी लड़का सोनू आज जीभर रोया। पिता के सिरहाने पर बैठकर आंसू झरझर बहते ही रहे। सोमपाल उसका रोना महसूस कर रहा था पर आंख खोलने की हिम्मत न हुई। मां भी काम से घर पहुंच गई। मरहम पट्टी कुछ नहीं लगी थी। पूछा कहीं चोट है तो सोमपाल ने मना कर दिया। सोनू को वह समझाती रही कि पापा को कुछ नहीं हुआ है पर सोनू के आंसू थमने का नाम नहीं लेते। ये तीनों बिना कुछ खाए ही सो गए। आंख खुली तो सोनू का मन हुआ और उसने कह भी दिया कि अब आप काम पर मत जाओ। दो दिन बाप काम पर नहीं गया। पिछले 20 साल से वह सफाई कर्मी है पर अब तक पक्का नहीं हुआ। उसने बेटे को समझाया कि यदि काम पर नहीं गया तो उसको पगार नहीं मिलेगी। अभी पढ़ाई का खर्च भी है, मकान की छत टपकती है, इस पर सीमेंट का लिंटर डालना है। इसलिए कुछ साल और काम करेगा। सोनू के पास इसका कोई उत्तर नहीं था, सोमपाल ड्यूटी चला गया।
…इस बस्ती के करीब सवा सौ परिवारों की जिंदगी एक जैसी ही थी केवल गौरीशंकर ही परमानेंट सफाई कर्मी था। सोनू के मां-बाप मेहनत का कोई काम नहीं चूकते। उन्होंने करीब एक लाख रुपए बचा लिए थे। सोचा कि इंटर के बाद बेटे को कोई कोर्स कराएंगे। मकान पक्का करने का इरादा अभी नहीं था। कुछ ही महीने बीते कि मां बीमार पड़ गई। बीमार तो वह हमेशा ही रहती पर इस बार मुश्किलें बढ़ गईं। असल में सालों पहले एक नाले की सफाई करते समय उसके हाथ में लोहे का तार गढ़ गया था। ये घाव कभी भरा नहीं और काम चलता रहा। कभी पक जाता तो कभी त्वचा सख्त हो जाती। जब हाथ पूरा सूज गया और बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था तो सोमपाल पत्नी को अस्पताल ले गया। पता चला कि हाथ में कैंसर हो चुका है। सोमपाल ने बेटे को नहीं बताया पर पति-पत्नी दोनों घर में बेसुध बैठे रहे। दूसरे दिन पत्नी को अस्पताल में भर्ती कराना था, सड़क किनारे पड़े कूड़े के ढेर उठाना भी जरूरी था। बेटे ने इंटर की परीक्षा दी थी। मोहल्ले के सभी लोग अपने कामों में व्यस्त थे। सोमपाल ने रात में हिचकते हुए बेटे से कहा कि यदि वह जरा काम में हाथ बंटा देता तो सुबह मां को अस्पताल ले जाता। सोनू ने कूड़ा उठाने के लिए मना कर दिया। उसकी बात सुन कर सोमपाल बोला बेटा हमें कोई दूसरी नौकरी नहीं मिलेगी। सरकारों की सारी बातें झूठी हैं। मैंने भी अपने जमाने में इंटर किया था, लेकिन काम यही करना पड़ा। ये जालिम व्यवस्था हमें ऊपर नहीं उठने देगी। पूरी रात नींद नहीं आई। सोमपाल सुबह देर तक नहीं उठा। उसे बहुत जगाया पर आंख नहीं खुली। मोहल्ले वाले आए, सांस चल रही थी। मुंह पर पानी के छींटे मारे, सोमपाल की आंख खुल आई। एक वाहन में लाद कर तीनों को अस्पताल की तरफ ले गए। सोमपाल ने बेटे को रास्ते में कूड़े के ढेर के पास उतार दिया-बोला अब उठा ले मेरे बच्चे हमारा खानदानी झाडू़ है।
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