आवारा जानवरों से मुक्ति पाने के कई उपाय, मगर घातक संक्रमित दो पैर वालों पर किस का जोर

लैटिन भाषा में रैबीज का अर्थ भी पागलपन
चंद्रशेखर जोशी
नैनीताल। कहते हैं कुत्ते हैं पागल। सड़कों पर दौड़ाते हैं, झुंड बनाकर घात लगाते, बच्चों पर झपटते हैं, अकेले कोई दिख जाए तो शिकार मान कर टूटते हैं।
…यहां पागल तो बहुत हैं जनाब। सीजन में इनकी संख्या में भारी इजाफा होता है। लैटिन भाषा में रैबीज का अर्थ भी पागलपन होता है। असल में पर्यटन स्थलों में पहुंचने वाले इन रैबीजों से कुत्ते-बंदरों का पागलपन बढ़ जाता है। जानवरों का पागलपन दिखता है, इसके इलाज भी हैं, लेकिन मानव का लाइलाज पगलपन आंखों को माफ है।
…गर्मी बढ़ते ही तराई-भावर के शहरों से लेकर दूर देश तक के आवारा भी सरोवरनगरी नैनीताल में एकत्र हो जाते हैं। इनमें कुछ बेहद खूंख्वार होते हैं। ऐसे दौ पैरों वाले शातिर यहां पहुंचने से पहले ही रास्ते में किसी को ठिकाने लगा देते हैं, कुछ ऊंची चोटियों पर घूमने के बहाने साथ लाए महिला को धक्का दे देते हैं। हर सीजन में यहां के जंगलों में लाशें मिलना आम बात हो गई है।
…पास के शहरों से बाजार बंदी के दिन धनवान व्यापारी और दुकानों में काम करने वाले लफंग लड़के रास्ते भर रैबीज के खतरनाक वायरस फैलाते हुए यहां पहुंचते हैं। इनके फैंके बीयर और शराब की बोतलें, फास्ट फूड के आधे-अधूरे पैकेट कुत्ते-बंदरों का भोजन बनते हैं। अल्कोहल की बूदें जानवरों के लिए खतरनाक होती हैं। चिकित्सक बताते हैं कि इससे जानवरों का स्नायविक तंत्र बिगडने लगता है। कुछ समय बाद जानवरों का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। वह हर जीव को काटखाने दौड़ते हैं। फास्ट फूड में तेज नमक, मिर्च, मोनो-सोडियम ग्लुकामेट, सोडियम नाइट्रेट जैसे तत्व जानवरों की प्रवृत्ति बदल देते हैं। इन रसायनों से उनमें डर की भावना खत्म होने लगती है, वह ढीट बन जाते हैं।
…इस छोटे से शहर में दिन-रात कोलाहल रहता है। आधी रात के बाद दो से तीन बजे के बीच सड़कों पर भीड़ जरा कम होती है। बांकी के 20-22 घंटे तल्लीताल से मल्लीताल कदमताल करने वालों का हुजूम उमड़ा रहता है। आवारा कुत्तों के लिए कोई सुनसान स्थान नहीं, जहां पर वह कुछ देर आराम कर सकें। बताते हैं कि पर्याप्त नींद न आने से शरीर में भूख बढ़ाने वाले हार्मोंस 25 से 30 फीसदी तक अधिक बनते हैं। इससे जानवरों की भूख खत्म नहीं होती और वह जो मिल जाए उसे खाने लगते हैं। बासी और सड़ी चीजें खाने से इनमें संक्रमण होने लगता है। बीमारियां इनके स्वभाव को बदल देती हैं। भीड़ और शोर जंगली जानवरों को ज्यादा प्रभावित करते हैं। इससे बंदर, लंगूरों में मानव का डर कम होने लगता है।
…आवारा कुत्तों को कोई देख ले तो उन पर पत्थर फैंकना आम बात है। इससे अधिकतर कुत्ते चोटिल हो जाते हैं। रैबीज वायरस कुत्तों की चमड़ी पर निष्क्रिय पड़ा रहता है। घाव से यह वायरस जानवरों के खून में प्रवेश कर जाता है। इसके बाद इनमें गुणात्मक वृद्धि होती है। वायरस से मस्तिष्क की कोशिकाएं बुरी तरह प्रभावित होने लगती हैं। कुछ ही समय बाद वायरस कुत्ते के स्नायु तंत्र तक पहुंच जाता है। रैबीज से प्रभावित कुत्ते को बुखार रहता है, वह सुस्त पड़ जाता है। इस समय उसे आराम करने की कोई जगह नहीं मिलती और वह उत्तेजित हो उठता है। रास्ते में भागते रहने से वायरस उसकी लार से जमीन पर बरसते हैं और दूसरे कुत्ते तक पहुंच जाते हैं। हालांकि पागलपन सवार होने के कुछ दिनों बाद कुत्ता मर जाता है, लेकिन तब तक दर्जनों जानवर संक्रमित हो जाते हैं। पर्यटन शहरों में ऐसी ही मिलती-जुलती हरकतें गैर जानवरों में भी पाई जाती हैं।
…यहां के बड़े व्यापारियों में भी अजब का पागलपन सवार रहता है। फड़-ठेले लगा कर जीवन बसर करने वालों पर इनकी शिकारी नजर हमेशा तिरछी रहती है। सीजन के ठीक पहले ये लाल आंखें बना कर पुलिस और प्रशासन के पास पहुंच जाते हैं। इनकी जुबान से निकली बातों से वायरस कई विभागों को संक्रमित कर देते हैं। इसके बाद वर्दी और बिना वर्दी के कर्मचारी झुंड बना कर दिनभर छोटे व्यवसाइयों को दौड़ते हैं। इनके डंडे बुजुर्ग, महिलाओं और बच्चों को भी बड़े घाव देते हैं। इस झुंड की आवाज रैबीज संक्रमितों से कम खतरनाक नहीं होती। सड़क किनारे और मैदान में सामान बिखेर कर ये पूरे माहौल में वायरस फैला देते हैं।
…सैलानियों पर होटल वालों की लार गजब टपकती है। अंदर प्रवेश करते ही मालिक के कारिंदे उनकी जेब टटोलते हैं। कुछ महिलाओं और युवतियों पर अपनी पगलाई नजरों को दौड़ाते हैं। इनकी जुबान से निकलने वाले हर शब्द के कई अर्थ होते हैं। शरीर की हरकतें श्रैबीज पीडि़त जानवर से कम नहीं होतीं। होटलों में इनसे नजरें बचा कर आगे बढना ही समझदारी मानी जाती है।
…पर्यटकों के साथ एक विकट प्रजाति भी यहां पहुंचती है। 20 से 35 साल की उम्र की इस प्रजाति की हरकतें हर किसी को पागल किए रहती हैं। बीच शहर से लेकर ऊंचे पहाड़ के शीर्ष तक इनके वायरस पर्यटन स्थलों की संस्कृति को संक्रमित कर देते हैं। इनसे नजरें बचा कर आगे निकलना भी संभव नहीं रहता। धीरे-धीरे यहां के निवासियों में भी यही पागलपन सवार होने लगता है और बीमारी फैलती जाती है। सांस्कृतिक रैबीज पीडि़तों लंबा जीवन जीते हैं और ताउम्र दूसरों में इसके वायरस ट्रांसफर करते रहते हैं।
…आवारा जानवरों से मुक्ति पाने के कई उपाय हैं, लेकिन घातक संक्रमित दो पैर वालों पर किसी का जोर नहीं।

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