एक्शन में कुमाऊं कमिश्नर, पसंद नहीं बहानेबाजी व टालमटोली

आयुक्त राजीव रौतेला के तेवरों से मंडलभर के अफसरों व कर्मचारियों में खलबली
चंद्रशेखर बेंजवाल
हल्द्वानी। अभी कुछ ही वक्त पहले की तो बात है, जब कुमाऊं मंडल का कमिश्नरेट ( आयुक्त कार्यालय) राज भवन जैसा महसूस होता था। एकदम शांत, कोई हलचल नहीं। आयुक्त पद पर बैठे कोई वरिष्ठ आईएएस अपने बंगले में आराम फरमाते नजर आते और साल में एकाध मंडलीय समीक्षा के अलावा मूक भाव से सरकार का कामकाज होता देखते रहते। साहब आराम में और नीचे जिलों में तैनात अफसर भी साहब की इस आरामपसंदगी से खुश। लेकिन पिछले कुछ महीने से कमिश्नरेट के तौर-तरीके बदले नजर आ रहे हैं। अब अफसर नैनीताल की ओर नजर उठाकर देखते हैं तो उनके हलक सूखने लगते हैं और नैनीताल में बैठक के नाम पर इस कम तापमान के शहर में भी पसीना छूटने लगता है। पिछले कुछ महीनों में यह बदलाव आया है नए आयुक्त राजीव रौतेला की नियुक्ति के साथ।
अभी कुछ ही दिन पहले की तो बात है, कमिश्नर भीमताल के दौरे पर निकले थे। आयुक्त रौतेला अचानक नगर पालिका कार्यालय में भी पहुंच गए। वहां पसरे कूड़े के ढेरों पर जब अधिशासी अधिकारी भूपेंद्र सिंह रावत से पूछा गया तो अधिशासी अधिकारी का जवाब आयुक्त का पारा चढ़ाने के लिए काफी था। अधिशासी अधिकारी ने ज्योंही कहा कि मेरा तो अगले महीने रिटायरमेंट है। मैं अकेला हूं, क्या-क्या देखूं, आयुक्त बिफर पड़े और जिलाधिकारी को तुरंत अधिशासी अधिकारी का वेतन व पेंशन रोकने के निर्देश के साथ-साथ उन्हें तुरंत शासन के लिए कार्यमुक्त करने के निर्देश भी दिए। इन तेवरों को दिखाने के कुछ दिन के बाद ही आयुक्त हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी हॉस्पिटल व मेडिकल कॉलेज में थे। आयुक्त ने एक-दो नहीं पूरे नौ घंटे इस परिसर में बिताए। जहां-जहां कुछ खटका, उस पर टोका। उसे सुधारने के निर्देश दिए। आयुक्त भले ही अपनी रौ में थे, पर साथ चल रहे अफसरों के दिल में यही धुकधुकी थी कि न जाने कब उन्हें क्या खामी नजर आ जाए और न जाने किस की शामत आ जाए।
इसके अलावा बीते दिनों आयुक्त अधिकारी कर्मचारियों को समय से कार्यालय पहुंचने और जिम्मेदारी से काम रिने के फरमान के साथ ही तैनाती स्थल के आसपास रहने के निर्देश दे चुके हैं।
आयुक्त के इन तेवरों का सिलसिला मंडल मुख्यालय से लेकर जिला मुख्यालयों तक बरकरार है। वह जिस भी जिले में जाते हैं, उनकी पैनी नजर व्यवस्था की खामियों पर पड़ती है। वह इस खामी के जिम्मेदार को तलाशते हैं और तुरंत सुधार के आदेश देते हैं। अफसरों की बैठक लेते हुए उनके सवाल तीखे होते हैं और वह समस्याओं पर त्वरित समाधान चाहते हैं। बहानेबाज व टालमटोल करने वाले उन्हें हर्गिज पसंद नहीं और वो लोग भी उनके पसंद के खाके में नहीं है, जो सरकारी नौकरी को अपनी मर्जी की चेरी समझते हैं। यही कारण है कि श्रम उपायुक्त विनीत कुमार बिना अनुमति के छुट्टी पर गए तो कमिश्नर ने उनका तीन दिन का वेतन काटने के निर्देश दे दिए। स्वाभाविक है कि आयुक्त की इस ताबड़तोड़ शैली से उन अफसरों को तकलीफ हो रही होगी, जो अब तक आराम और बेफिक्री की सरकारी शैली की चलताऊ नौकरी कर रहे थे।
जब भी कोई तेजतर्रार शैली का अफसर तैनात होता है तो अब चले आ रहे सिस्टम के आदी हो चुके लोगों द्वारा उसका विरोध होना भी लाजिम है। भीमताल की कार्रवाई के बाद रौतेला के खिलाफ भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं, लेकिन रौतेला के मिजाज को देखकर नहीं लगता कि वह इस तरह के विरोधों से विचलित होने वाले हों। उन्हें विचलित होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि मंडल में नौकरशाही-बाबूशाही की काहिली को तोड़ने के लिए ऐसी ही सख्त मिजाजी की जरूरत है। ऐसी ही सख्तमिजाजी आम आदमी को यह संदेश देने में सफल हो सकती है कि तंत्र में लोक की सुनी जा रही है। लेकिन वर्षों से जड़ और यथास्थिति की अभ्यस्त हो चुकी नौकरशाही में इतना झकझोरने भर से ही बदलाव आ जाएगा, यह मुमकिन नहीं लगता। इसके लिए तो लगातार चलना होगा। अमेरिकी कवि राबर्ट फ्रॉस्ट के शब्दों में…. ।And miles to go before I sleep.
लेखक पंच आखर के सम्पादक हैं।

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